Friday, March 09, 2012

सुनो कबीर {हाइकु नवगीत}

त्रिलोक सिंह ठकुरेला का यह नवगीत ५ , ७, ५ अक्षरों के अनुशासन में है जो कि हाइकु कविता की पहचान है, इसलिए इसे हाइकु नवगीत के रूप में यहाँ दिया जा रहा है, आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
-सम्पादक


 -त्रिलोक सिंह ठकुरेला .
सुनो, कबीर
बचाकर रखना
अपनी पोथी.
सरल नहीं
गंगा के तट पर
बातें कहना  .
घडियालों  ने
मानव बनकर
सीखा रहना .
हित की बात
जहर सी लगती
लगती थोथी

बाहर कुछ
अन्दर से कुछ हैं
दुनिया वाले .
उजले लोग
मखमली कपड़े
दिल है काले.

सब ने रखी
ताक पर जाकर
गरिमा जो थी


6 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बेहतरीन है सर!


सादर

vandana said...

अच्छी रचना

sharda monga (aroma) said...

सुंदर अभिव्यक्ति.

sharda monga (aroma) said...

सुंदर अभिव्यक्ति

वीरेश अरोड़ा "वीर" said...

मैंने पहली बार हाइकु कविता पढ़ी है.... मेरे लिए बिलकुल नयी विधा .... रचना बहुत ही अच्छी लगी ....बहुत बहुत बधाई .

कल्पना रामानी said...

बहुत ही सुंदर और सधी हुई अद्भुत रचना है। प्रेरणादायक।