Thursday, March 08, 2012

कभी नहीं बिखरे

-सुशील सरित

बिना किसी गंतव्य लक्ष्य के
पत्थर बाँधे हुए पाँव में
हम भी खूब फिरे।

यही बहुत है, फिसले, सम्हले
लेकिन नहीं गिरे
कई बार निष्ठायें बदलीं
कई बार पाले
तोड़ नहीं पाये खुद ऍसे
बाँधे थे जाले
यही बहुत है हाथों से बस
छूटे नहीं सिरे।

जो जिसने कह दिया उसे ही
सत्य वचन माना
दृष्टि बाँध ली पहले फिर
जंगल-जंगल छाना
यही बहुत है इन्द्रजाल में
ज्यादा नहीं घिरे।

नदी नाव संयोग सभी ने
कितनी बार छला
बार-बार आशंकाओं ने
मुख पर रंग मला
यही बहुत है टूटे लेकिन
कभी नहीं बिखरे।



-( सम्यक, नवगीत विशेषांक से साभार)

9 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत ही बढ़िया सर!


सादर

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 10/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

vandana said...

जीवन की मजबूरियों का चित्रण और मन को सहलाती रचना
इस बार मधुमती का भी गीत विशेषांक था नीचे उसका लिंक भेज रही हूँ
http://rsaudr.org/show_adition.php?id=janfeb_2012

Saras said...

नाउमीदियों के बीच कई ऐसे मकाम आते हैं ..जब सब्र का दामन हाथ से छूटता जाता है ..फिर भी एक आस उसे थामे रहती है ....शायद !!!!!!....बहुत ही सशक्त भावपूर्ण प्रस्तुति

expression said...

बहुत खूबसूरत गीत...

शुक्रिया..
सादर.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अच्छी रचना

Ramakant Singh said...

beautiful lines withdeep expression of emotions.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

सुन्दर नवगीत...
सादर बधाईयाँ..

Brijesh Singh said...

बहुत सुन्दर!