Friday, February 10, 2012

ज़िन्दगी


-डा० महेंद्र भटनागर

बिखरता जा रहा सब कुछ
सिमटता कुछ नहीं !

ज़िन्दगी
एक बेतरतीब सूने बंद कमरे की तरह,
दूर सिकता पर पड़े तल-भग्न बजरे की तरह,
हर तरफ़ से कस रहीं गाँठें
सुलझता कुछ नहीं !

ज़िन्दगी क्या ?
धूमकेतन-सी अवांछित
जानकी-सी त्रस्त लांछित,
किस तरह हो संतरण
भारी भँवर, भारी भँवर !
हो प्रफुल्लित किस तरह बेचैन मन
तापित लहर, शापित लहर !
.
ज़िन्दगी :
बदरंग केनवस की तरह
धूल की परतें लपेटे
किचकिचाहट से भरी,
स्वप्नवत है
वाटिका पुष्पित हरी !
हर पक्ष भावी का भटकता है
सँभलता कुछ नहीं !

पर, जी रहा हूँ
आग पर शय्या बिछाये !
पर, जी रहा हूँ
शीश पर पर्वत उठाये !
पर, जी रहा हूँ
कटु हलाहल कंठ का गहना बनाये !
ज़िन्दगी में बस
जटिलता ही जटिलता है
सरलता कुछ नहीं !

4 comments:

sushma 'आहुति' said...

जीवन का कटु सत्य है.... जिससे आपने अवगत कराया है....

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति
आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 13-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

ana said...

gahan vichar ....ati sundar

anugoonj said...

Very nice