Friday, January 13, 2012

अनचाहे फूलेंगे टेसू के फूल

[ डा० विनोद निगम ]

-विनोद निगम


बीती दुहरायेंगे
तन मन भरमायेंगे
प्राणों को छू लेंगे टेसू के फूल

धूप की चिरैया
अमराई के आंगन में
फुदकेगी, गाएगी
बंसवट के कानों में
उम्र च़ढी हवा
प्रीति के स्वर दुहराएगी
दृग में तिर जाएंगे
पानी में उतराते
जोड़े सुरखाबों के
महुए की डाल
झुकेंगी, परिचित बाँहों सी
बाँहों तक जाएंगी
आसपास झूमेंगे
सुधियों को चूमेंगे
नयनों में झूलेंगे, टेसू के फूल

इच्छाओं के तन पर
रह रह पुरवाई के
कांटे चुभ जाएंगे
आँखों में,
बुझे हुए खालीपन के
अनगिन बिरवे अंखुवाएंगे
सूनापन डोलेगा
आंगन दहलीजों के
बन्द द्वार खोलेगा
अमलतास के पत्तों से
झरते चन्दन-क्षण
लौट नहीं आएंगे
प्यास को उगाएंगे
सांस में समाएंगे,
जन्म भर न भूलेंगे
टेसू के फूल

7 comments:

S.N SHUKLA said...

बहुत सुन्दर रचना , बधाई.

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति है आपकी

कुमार संतोष said...

सुंदर बेहद खूबसूरत गीत !
शब्दों में नयापन भी मिला !
आभार !

JHAROKHA said...

aadarniy sir
aapko comment karun main is yogy to nahi hun par aapki prastuti se mujhe kuchh seekhne ko mila.
shabdo ka samanjasy aor chunav dono ne hi man ko bhaut hi aakarshhit kiya
sadar naman
poonam

रेखा said...

गीतों की पंक्तियाँ अच्छी लगी ..

vandana said...

बहुत सुन्दर नवगीत

पूरा आकाश said...

बहुत सुन्दर नवगीत है