Saturday, December 24, 2011

बंटवारा कर दो ठाकुर

-महेश अनघ

बंटवारा कर दो ठाकुर।
तन मालिक का
धन सरकारी
मेरे हिस्से परमेसुर

शहर धुंए के नाम चढ़ाओ
सड़कें दे दो झंडों को
पर्वत कूटनीति को अर्पित
तीरथ दे दो पंडों को
खीर खांड ख़ैराती खाते
हमको गौमाता के खुर


सब छुट्टी के दिन साहब के

सब उपास चपरासी के
उसमें पदक कुंअर जू के हैं
खून पसीने घासी के
अजर अमर श्रीमान उठा लें
हमको छोड़े क्षण भंगुर

पंच बुला कर करो फ़ैसला
चौड़े चौक उजाले में
त्याग तपस्या इस पाले में
राजभोग उस पाले में
दीदे फाड़-फाड़ सब देखें
हम देखेंगे टुकुर-टुकुर

13 comments:

vandana said...

बहुत सुन्दर हिस्से की मांग

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल सोमवारीय चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ पर भी होगी। सूचनार्थ

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 26/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

संतोष कुमार said...

आपकी प्रस्तुति अच्छी लगी ।
बहुत सुंदर पंक्तियां।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूब ...

Dr. shyam gupta said...

अर्थात हमें हिस्सा क्यों न मिला...लूट में...बडी बेईमानी है हुज़ूर...

सदा said...

बहुत बढि़या।

वन्दना said...

सुन्दर रचना।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बहुत खुबसूरत सार्थक नवगीत....

सादर बधाई...

uljheshabd said...

बढ़िया अनघ साहब.....

Ratan Singh Shekhawat said...

सुन्दर रचना

Gyan Darpan
..

dheerendra said...

बहुत सुंदर रचना,...अच्छी प्रस्तुती,
क्रिसमस की बहुत२ शुभकामनाए.....

मेरे पोस्ट के लिए--"काव्यान्जलि"--बेटी और पेड़-- मे click करे

drpradeepk shukla said...

वाह !! कमाल का लिखा है अनघ साहब ने .... बहुत सुन्दर