Tuesday, December 06, 2011

कुटी चली परदेश कमाने

-शीलेन्द्र कुमार सिंह चौहान

कुटी चली परदेश कमाने
घर के बैल बिकाने
चमक दमक में भूल गई है
अपने ताने बाने


राड बल्ब के आगे फीके
दीपक के उजियारे
काट रहे हैं फुटपाथों पर
अपने दिन बेचारे
कोलतार सड़कों पर चिड़िया
ढूँढ़ रही है दाने


एक एक रोटी के बदले
सौ सौ धक्के खाये
किन्तु सुबह के भूले पंछी
लौट नहीं घर आये
काली तुलसी कैक्टस दल के
बैठी है पैताने


गोदामों के लिए बहाया
अपना खून पसीना
तन पर चमड़ी बची न बाकी
ऐसा भी क्या जीना
छाँव बरगदी राजनगर में
आई गाँव बसाने

3 comments:

रविकर said...

खूबसूरत प्रस्तुति ||
बहुत बहुत बधाई ||

terahsatrah.blogspot.com

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर प्रविष्टि

vandana said...

वाह..... सच्ची अभिव्यक्ति