Thursday, December 01, 2011

बड़ा गर्म बाजार

-निर्मल शुक्ल
बची-खुची बरगद की साँसें
है फिर घटी-घटी

पल भर को तो लगा घटायें
अब कौंधी अब बरसीं
आग निगलती सुधियाँ लेकिन
फिर बूँदों को तरसीं

व्यस्त हवायें लिखा-पढ़ी में
ऋतुयें बटी-बटी

बड़ा गर्म बाजार लगे बस
औने-पौने दाम
निर्लज्जों की साँठ-गाँठ में
डूबा कुल का नाम

ऊबासाँसी लेती बेघर
पलकें हटी-हटी

खट-खट सुनते-सुनते पक गये
दरवाजों के कान
आहट, सगुनाहट सब कोरी
खाली गई जबान

रहीं ताकती दालानो को
आँखें फटी-फटी।

2 comments:

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बची खुची बरगद की साँसे
फिर हैं घटी घटी//

सुन्दर नवगीत...
सादर...

S.N SHUKLA said...

बहुत सुन्दर , बधाई.