Thursday, September 29, 2011

बांध गई मुस्कान किसी की

-विजय किशोर मानव












बांध गई मुस्कान किसी की
घेरों में
बिछुए से पड़ गए
कुआंरे पैरों में

धूप-धूप हो गईं
शिराएं
रक्तचाप छू गईं
हवाएँ
शब्द-वृत्त मदहोश
छुअन के
अर्थ-बोध
तुलसी-चंदन के
सांसें जैसे बंधी
सतपदी फेरों में ।

सूखे दिन
आसाढ़ हो गए
सपने तिल से
ताड़ हो गए
सन्नाटे लिख गए
समास अंधेरों में ।


( पूर्व कार्यकारी संपादक- कादम्बिनी )

9 comments:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

रविकर said...

बहुत खूब ||
बधाई व्योम जी ||

रेखा said...

सुन्दर रचना .....

रेखा said...

सुन्दर रचना .....

S.N SHUKLA said...

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना , बधाई

कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें

S.N SHUKLA said...

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना , बधाई

कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें

त्रिलोक सिंह ठकुरेला said...

Ati Sundar.
triloksinghthakurela.blogspot.com

डा० व्योम said...

आज विजय किशोर मानव का नवगीत प्रकाशित किया जा रहा है। मानव जी सुप्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका कादम्बिनी के कार्यकारी सम्पादक रहे हैं। आपके अनेक नवगीत काफी लोकप्रिय हुए हैं। कृपया अपनी गरिमामय टिप्पणी लिखकर नवगीत और नवगीतकार का सम्मान करें।

Anonymous said...

Shabdon ka jadu bhavnaon ke jadugar dwara....badhai