Monday, September 12, 2011

गीत लेकर आ गए

-यश मालवीय

गीत लेकर आ गए हैं
हम तुम्हारी सभ्यता पर
संस्कृति से छा गए हैं।

ये सुबह शामें हमारी
और अनदेखी तुम्हारी
अब समझ आने लगी है
नींद की सारी खुमारी

गीत लेकर आ गए हैं
रात भी अब क्या करेगी
जागने को भा गए हैं ।


धूप में कालाबजारी
बहुत देखी सेंधमारी
अब नकद भूगतान लेगी
ज़िंदगी ही हर उधारी

गीत लेकर आ गए है
अब नहीं वो गीत गाना
जो गवैये गा गए हैं।


लोग ज्यों हारे जुआरी
हो चुकी मर्दुमशुमारी
सुख न कोई मोल पाए
खर्च करके रेजगारी

गीत लेकर आ गए हैं
अब किले उनके ढहेंगे
जो सितम सा ढा गए हैं।


आड़ में चोरी चकारी
शाह से हो चुकी यारी
अब मिलेगी ख़ाक में
ओढ़ी हुई सी ख़ाकसारी

गीत लेकर आ गए हैं
हम कि अपने को अचानक
भीड़ ही में पा गए हैं।

( सम्यक् पत्रिका के नवगीत विशेषांक से साभार )

8 comments:

जयकृष्ण राय तुषार said...

भाई डॉ० व्योम जी यश मालवीय हमारे समय के एक बड़े नवगीत कवि है उनकी काव्य यात्रा सदवाहिनी नदी के सामान है आपको और यश जी को बधाई

जयकृष्ण राय तुषार said...

भाई डॉ० व्योम जी यश मालवीय हमारे समय के एक बड़े नवगीत कवि है उनकी काव्य यात्रा सदवाहिनी नदी के सामान है आपको और यश जी को बधाई

S.N SHUKLA said...

सुन्दर रचना , सुन्दर भावाभिव्यक्ति , बधाई



कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें .

navgeet said...

अति शीघ्र प्रतिक्रिया लिखने के लिये तुषार जी का आभार।

kamlesh bhatt kamal said...

यश मालवीय के इस बहुत प्यारे और सकारात्मक ऊर्जा से ओतप्रोत नवगीत के लिये हार्दिक वधाई।

कमलेश भट्ट कमल

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर वाह!

रेखा said...

इस सुन्दर गीत के लिए आभार ....

पहल said...

बहुत अच्छा और सामयिक नवगीत के लिये वधाई।