Monday, September 12, 2011

गीत लेकर आ गए

-यश मालवीय

गीत लेकर आ गए हैं
हम तुम्हारी सभ्यता पर
संस्कृति से छा गए हैं।

ये सुबह शामें हमारी
और अनदेखी तुम्हारी
अब समझ आने लगी है
नींद की सारी खुमारी

गीत लेकर आ गए हैं
रात भी अब क्या करेगी
जागने को भा गए हैं ।


धूप में कालाबजारी
बहुत देखी सेंधमारी
अब नकद भूगतान लेगी
ज़िंदगी ही हर उधारी

गीत लेकर आ गए है
अब नहीं वो गीत गाना
जो गवैये गा गए हैं।


लोग ज्यों हारे जुआरी
हो चुकी मर्दुमशुमारी
सुख न कोई मोल पाए
खर्च करके रेजगारी

गीत लेकर आ गए हैं
अब किले उनके ढहेंगे
जो सितम सा ढा गए हैं।


आड़ में चोरी चकारी
शाह से हो चुकी यारी
अब मिलेगी ख़ाक में
ओढ़ी हुई सी ख़ाकसारी

गीत लेकर आ गए हैं
हम कि अपने को अचानक
भीड़ ही में पा गए हैं।

( सम्यक् पत्रिका के नवगीत विशेषांक से साभार )