Saturday, September 10, 2011

याद आया गाँव

-कृष्ण शलभ
याद आया, गाँव हमको
याद आया ।

याद आया, गाय का घी-दूध मट्ठा
बाजरे की रोटियाँ, आचार खट्टा
शहर में तो आज तक
कुछ भी न भाया
याद आया ।

याद आया पेड़ पर चढ़ना, चढ़ाना
हों किसी के भी पके अमरूद खाना
और सबसे देखना
खुद को सवाया
याद आया ।

याद आया खूब रस की खीर खाना
स्वाद कैसा था, बहुत मुश्किल बताना
बाद उसके फिर हमें
कुछ भी न भाया
याद आया ।

याद आया ईद, होली का मनाना
कौन क्या है यह सभी कुछ भूल जाना
शहर की रस्सा कसी में
कुछ न पाया
याद आया ।

3 comments:

रेखा said...

बहुत खुबसूरत ......आपकी रचना ने मुझे भी गाँव की याद दिला दी है

S.N SHUKLA said...

खूबसूरत रचना , आभार

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह! क्या बात है...बहुत सुन्दर