Thursday, September 08, 2011

भूल की

-डा० मृदुल शर्मा

धौंस किसी की नहीं कुबूल की
कहते हैं लोग, बड़ी भूल की ।

फूलों पर प्राण वारते रहे
मधुवन को ही सँवारते रहे
गले पड़ी दुश्मनी बबूल की ।

तने रहे सदा स्वाभिमान से
दूर रहे दरबारी गान से
और हवा अपने प्रतिकूल की ।

चुटकी भर सच ललाट पर धरे
पता नहीं किसको-किसको अखरे
कीमत खुद भी नहीं वसूल की
कहते हैं लोग बड़ी भूल की ।

( समांतर पत्रिका से साभार )

2 comments:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

खूबसूरत

Anonymous said...

" चुटकी भर सच ललाट पर धरे
पता नहीं किस किस को अखरे ।"

बहुत अच्छा, आपने तो सब कुछ कह दिया है।

-करैया