Monday, August 29, 2011

महानगर के जंगल में

-अश्वघोष
महानगर के जंगल में हम
घूम रहे होते
शायद हमने कर डाले
अनचाहे समझौते
संधिपत्र तो लिखे
प्यार की कीमत नहीं चुकी
अपने ही अधरों में बंदी
अपनी हँसी-खुशी
फूटे रिश्तों में
बैलों से जोते
महानगर के जंगल में हम
घूम रहे होते


अम्मा की रामायण-गीता
सहसा रूठ गई
हरिद्वार के गंगाजल की
शीशी फूट गई
पानी पर तिनके की नाईं
घूमे समझौते
शायद हमने कर डाले
अनचाहे समझौते

( "गई सदी के स्पर्श" नवगीत संग्रह,-2006 से साभार )