Sunday, August 28, 2011

सबके सब नंगे

-जय चक्रवर्ती

किसकी कौन कहे
हमाम में
सबके सब नंगे ।

बहरी राजसभा है सारी
अन्धा राजा है
बाहर-भीतर बन्द
महल का हर दरवाजा है
खुशहाली के इश्तहार
हर चौखट पर चिपके
यूँ, बस्ती की हालत का
सबको अन्दाज़ा है
काजल की
गंगा में
गूँज रही हर-हर गंगे ।


मुस्कानों पर अपना नाम
लिखा बटमारों ने
बिठा दिये हैं पहरे
चीखों पर जयकारों ने
अपने-अपने सम्मोहन के
इन्द्रजाल रचकर
नज़र बाँध दी सबकी
मौसम के ऐय्यारों ने
राजपाट का
गणित
लगाते हैं हिंसा-दंगे ।

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