Tuesday, August 09, 2011

मन होता है पारा

-रामानन्द दोषी

मन होता है पारा
ऐसे देखा नहीं करो !


जाने क्या से क्या कर डाला उलट-पुलट मौसम
कभी घाव ज़्यादा दुखता है और कभी मरहम
जहाँ-जहाँ ज़्यादा दुखता है
छूकर वहीं दुबारा
ऐसे देखा नहीं करो !


 कौन बचाकर आँख सुबह की नींद उतार गया
बूढ़े सूरज को पीछे से सीटी मार गया
शक हम पर पहले से था
तुम करके और इशारा
ऐसे देखा नहीं करो !


 होना जाना क्या है जैसे कल था, वैसा कल
मेरे सन्नाटे में बस खमोशी की हलचल
अँधियारे की नेमप्लेट पर
लिखकर तुम उजियारा
ऐसे देखा नहीं करो !


 मन होता है पारा
ऐसे देखा नहीं करो !!

3 comments:

सागर said...

bhaut hi sundar rachna...

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन अभिवयक्ति....

S.N SHUKLA said...

सुन्दर रचना , बहुत खूबसूरत प्रस्तुति