Sunday, July 17, 2011

नया दौर

-त्रिलोक सिंह ठकुरेला

परिवर्तन के
नये दौर मे
सब कुछ बदल गया ।

भूली कोयल
गीत सुरीले
मँहगाई की मारी
उपवन में
सन्नाटा छाया
पसर गई लाचारी
कैसे जुटें
नीड़ के साधन
व्याकुल हुई बया ।

जानबूझ कर बन्दर
मिलकर
मस्ती मार रहे
जहाँ लग रहा दाँव
वहीं से
माल डकार रहे
कोई जिये, मरे
उनको क्या
उन्हें न हया, दया ।

जंगल के राजा ने
सुनकर
राशन भिजवाया
कुछ को थोड़ा बाँट
तिकड़मी
जोड़ रहे माया
मन में लड्डू फूट रहे
संसाधन
मिला नया ।
परिवर्तन के
नये दौर मे
सब कुछ बदल गया ।।

3 comments:

kamlesh bhatt kamal said...

बहुत अच्छे और सार्थक नवगीत कर लिए वधाई।

geetgandh said...

बहुत सुन्दर नवगीत है।

S.N SHUKLA said...

परिवर्तन के नए दौर में
सब कुछ बदल गया

सुन्दर नवगीत, बहुत सुन्दर प्रस्तुति