Tuesday, July 05, 2011

हम पलाश के वन

-डा० जगदीश व्योम
ये कैसी आपाधापी है
ये कैसा क्रंदन
दूर खड़े चुप रहे देखते
हम पलाश के वन ।

तीन पात से बढ़े न आगे
कितने युग बीते
अभिशापित हैं जनम-जनम से
हाथ रहे रीते
सहते रहे ताप, वर्षा
पर नहीं किया क्रंदन
हम पलाश के वन ।

जो आया उसने धमकाया
हम शोषित ठहरे
राजमहल के द्वार, कंगूरे
सब निकले बहरे
करती रहीं पीढ़ियाँ फिर भी
उनका अभिनंदन
हम पलाश के वन । 

धारा के प्रतिकूल चले हम
जिद्दीपन पाया
रितु वसंत में नहीं
ताप में पुलक उठी काया
चमक दमक से दूर
हमारी बस्ती है निर्जन
हम पलाश के वन ।


-डा० जगदीश व्योम

(नवगीत की पाठशाला से साभार)

7 comments:

Chandra Bhushan Mishra 'Ghafil' said...

बहुत सुन्दर रचना

S.N SHUKLA said...

बहुत खूबसूरत पोस्ट, बधाई

सुनील गज्जाणी said...

namaskaar !
aap ke blog pe pehli baar aaya , aur aap ko padh kar achcha laga .
saadar

डा० व्योम said...

धन्यवाद सुनील गज्जाणी जी

योगाचार्य विजय said...

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Kanishka Kashyap said...

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vandana said...

bahut badhiya post