Wednesday, June 01, 2011

करघा व्यर्थ हुआ

-त्रिलोक सिंह ठकुरेला
करघा व्यर्थ हुआ
कबीर ने
बुनना छोड़ दिया

काशी में
नंगों का बहुमत
अब चादर की
किसे ज़रूरत
सिर धुन रहे कबीर
रुई का
धुनना छोड़ दिया ।

धुंध भरे दिन
काली रातें
पहले जैसी
रही न बातें
लोग काँच पर मोहित
मोती
चुनना छोड़ दिया ।

तन-मन थका
गाँव-घर जाकर
किसे सुनायें
ढाई आखर
लोग बुत हुए
सच्ची बातें
सुनना छोड़ दिया ।
करघा व्यर्थ हुआ
कबीर ने
बुनना छोड़ दिया ।

3 comments:

मनोज कुमार said...

बहुत सुंदर नवगीत।

नवगीत-पाठशाला said...

अच्छे नवगीतों के प्रकाशन की
एक और जगह पाकर प्रसन्नता हुई!
--
इस नवगीत की तो बात ही निराली है!

Kumar Ravindra said...

प्रिय व्योम जी,
एक बहुत अच्छा नवगीत। साधुवाद स्वीकारें ’व्योम’ जी इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए- भाई त्रिलोक ठकुरेला जी को भी मेरी ओर से हार्दिक साधुवाद!
आपकी ब्लाग-पत्रिका हेतु मैंने मई के प्रारंभ में दो नवगीत भेजे थे ई-मेल से- आपके एस.एम.एस. सन्देश के उत्तर में। आशा है आपको रुचे होंगे।
स्नेह-नमन!
कुमार रवीन्द्र